इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आकृति चौधरी के मामले में फैसला सुनाते हुए उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत जारी निरोध आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने न केवल इस हिरासत को खारिज किया, बल्कि आकृति को मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है। हाईकोर्ट का यह सख्त फैसला गौतमबुद्ध नगर जिला प्रशासन की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
सबूतों का अभाव और प्रशासनिक लापरवाही
मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने गौतमबुद्ध नगर प्रशासन की ढिलाई और अपर्याप्त साक्ष्यों पर कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने स्पष्ट रूप से पाया कि प्रशासन आकृति चौधरी के खिलाफ ऐसा कोई ठोस प्रमाण पेश नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो कि उन्होंने हिंसा भड़काई थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने मुख्य रूप से इन पहलुओं को रेखांकित किया:
- प्रशासन द्वारा जमा किए गए साक्ष्य आकृति को NSA के तहत बंद रखने के लिए पूरी तरह अपर्याप्त थे।
- आकृति चौधरी द्वारा किसी भी प्रकार की हिंसा या अराजकता फैलाने का कोई प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं मिला।
- बिना पुख्ता आधार के निवारक निरोध (प्रिवेंटिव डिटेंशन) जैसे सख्त कानूनों का प्रयोग प्रशासनिक तंत्र की मनमानी को दर्शाता है।
'राजनीतिक जुड़ाव नहीं, संवैधानिक कर्तव्य चुनें अफ़सर'
अदालत ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि इस मामले में आकृति चौधरी को 'सबक सिखाने' या एक नजीर बनाने की कोशिश की गई लगती है। पीठ ने चेतावनी दी कि अधिकारियों की ऐसी अतिशयता और प्रशासनिक मनमानी राज्य में व्यवस्था को भयावह स्थिति (Dystopia) की ओर धकेल देगी।
हाईकोर्ट ने नौकरशाहों को स्पष्ट संदेश दिया कि प्रशासनिक अधिकारियों को अपने राजनीतिक जुड़ाव और वफादारियों को दरकिनार कर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को सर्वोपरि रखना चाहिए। सामाजिक या राजनीतिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ निवारक निरोध कानूनों के इस तरह के दुरुपयोग पर अदालत ने गहरी चिंता जताई है और इसे सख्त चेतावनी के रूप में रेखांकित किया है।