रूसी कच्चे तेल की खरीद पर वैश्विक स्तर पर जारी चर्चाओं के बीच भारत के ऊर्जा बाजार में एक बड़ा बदलाव सामने आया है। आंकड़ों के मुताबिक, भारत अपनी जरूरत का 50 प्रतिशत से ज्यादा एलपीजी (लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस) आयात अकेले अमेरिका से कर रहा है।

अब तक मीडिया और वैश्विक बहसों में केवल रूस से भारत द्वारा खरीदे जा रहे क्रूड ऑयल पर ही ध्यान केंद्रित रहता था। हालांकि, रसोई गैस के मामले में अमेरिकी आपूर्ति का दायरा जिस तेजी से बढ़ा है, उसने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा व्यापार में नए समीकरण कायम कर दिए हैं।

ऊर्जा आयात का बदलता संतुलन

अपनी विशाल आबादी की रसोई गैस जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत बड़े पैमाने पर विदेशी आपूर्ति पर निर्भर रहता है। परंपरागत रूप से पश्चिम एशियाई (खाड़ी) देशों से होने वाले आयात के बीच अब अमेरिकी एलपीजी की हिस्सेदारी 50 फीसदी के पार पहुंच जाना एक रणनीतिक मोड़ माना जा रहा है।

घरेलू बजट और वित्तीय प्रबंधन पर असर

अंतरराष्ट्रीय बाजार में एलपीजी की कीमतों और आपूर्ति स्रोतों के उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम नागरिक की जेब पर पड़ता है। ऐसे में लोग अपनी वित्तीय स्थिति को संतुलित रखने के लिए कई प्रमुख साधनों का सहारा लेते हैं:

ऊर्जा क्षेत्र में अमेरिकी निर्भरता बढ़ने से भारत की आपूर्ति सुरक्षा तो मजबूत हुई है, लेकिन वैश्विक बाजार की कीमतें अंततः देश के विदेशी मुद्रा भंडार और आम आदमी के मासिक बजट को प्रभावित करती हैं।