इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद के प्रबंधन पर लगाए गए 6.41 करोड़ रुपये के जुर्माने की वसूली पर अंतरिम रोक लगा दी है। जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को तीन हफ्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत इस मामले पर अब 12 अक्टूबर को अगली सुनवाई करेगी।
यह याचिका मोहम्मद तनवीर अहमद की ओर से दाखिल की गई है। इसमें सहारनपुर के सिटी मजिस्ट्रेट द्वारा 16 जुलाई को पारित बेदखली व हर्जाने के आदेश और 2 सितंबर को जिला जज द्वारा अपील खारिज किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई है। यह पूरा मामला 'सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम' के तहत दर्ज किया गया था।
मामले से जुड़ा घटनाक्रम
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में लगभग 315 वर्ग मीटर जमीन पर बनी इस मस्जिद को हटाने के लिए प्रशासन ने कानूनी कार्रवाई की थी। घटनाक्रम इस प्रकार रहा:
- 16 जुलाई: सिटी मजिस्ट्रेट ने मस्जिद को हटाने का निर्देश दिया और प्रबंधन पर 6.41 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया।
- 2 सितंबर: जिला अदालत ने सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ दायर अपील खारिज कर दी।
- 5 सितंबर: अपील खारिज होने के तीन दिन बाद प्रशासन ने मस्जिद ध्वस्त कर दी।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आशीष कुमार सिंह ने पीठ के समक्ष कहा कि प्रशासन ने मालिकाना हक (टाइटल) तय किए बिना ही जल्दबाजी में मस्जिद ढहा दी। उन्होंने दलील दी कि 1956 के राजस्व रिकॉर्ड में जमीन पर वाहिद खान और याकूब खान का नाम दर्ज था और लंबे समय से इसका इस्तेमाल वक्फ संपत्ति के रूप में हो रहा था। उन्होंने कहा कि निचली अदालतों ने इन तथ्यों पर ध्यान नहीं दिया।
दूसरी तरफ, राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता का रुख विरोधाभासी है—एक तरफ संपत्ति को जमींदार का बताया जा रहा है और दूसरी तरफ वक्फ का, जबकि इसे वक्फ को समर्पित किए जाने का कोई दस्तावेज नहीं है। गोयल ने यह भी कहा कि सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को पक्षकार नहीं बनाया गया है और सरकारी अभिलेखों में यह जमीन कलेक्ट्रेट कचहरी के नाम दर्ज रही है।
मलबे में मिला कुआं, ASI कर रहा जांच
मस्जिद ढहाए जाने के बाद मलबा हटाते समय वहां करीब 20 फीट गहरा और 1.5 मीटर चौड़ा एक पुराना कुआं मिला, जो लोहे की चादरों से ढका हुआ था। सदर एसडीएम सुबोध कुमार के अनुसार, कुएं की प्राचीनता और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की जांच के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की टीम को बुलाया गया। एएसआई टीम ने कुएं की पैमाइश की, मिट्टी और ईंटों के नमूने एकत्र किए और वीडियोग्राफी कराई।
इस घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी जारी है। मामले के शिकायतकर्ता और बजरंग दल के पूर्व संयोजक विकास त्यागी ने दावा किया कि मस्जिद बनने से पहले वहां प्राचीन मंदिर रहा होगा। वहीं, स्थानीय कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा कि यह कुआं मस्जिद का ही हिस्सा था, जिसका इस्तेमाल नमाजी 'वजू' (हाथ-पैर धोने) के लिए करते थे। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने इस कार्रवाई को लेकर राज्य सरकार पर निशाना साधा है।