टेक्सास के डलास में आयोजित रिपब्लिकन कन्वेंशन के मंच से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा राजनीतिक दांव खेला है। उन्होंने ऐलान किया है कि अगर आगामी नवंबर के मिडटर्म चुनावों में उनकी पार्टी 'हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स' और 'सीनेट' दोनों में बहुमत हासिल कर लेती है, तो देश के हर बालिग नागरिक को 5,000 डॉलर (करीब 4.15 लाख रुपये) दिए जाएंगे।

1.3 ट्रिलियन डॉलर का भारी खर्च और अधूरी योजना

अमेरिका में इस समय लगभग 27 करोड़ बालिग नागरिक हैं। इस हिसाब से अगर ट्रंप का यह वादा जमीन पर उतरता है, तो अमेरिकी खजाने पर करीब 1.3 ट्रिलियन डॉलर का सीधा भार पड़ेगा। ट्रंप ने इस योजना को 'ट्रंप डिविडेंड' (ट्रंप लाभांश) का नाम दिया है, लेकिन इसे लागू करने की पूरी रूपरेखा पर वे चुप्पी साध गए।

भाषण के दौरान उन्होंने कुछ शर्तें भी सामने रखीं:

ईरान युद्ध और बढ़ती महंगाई के बीच चुनावी चाल

ट्रंप का यह ऐलान ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी जनता तेल की आसमान छूती कीमतों और बढ़ती महंगाई से जूझ रही है। फरवरी में अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू की गई सैन्य कार्रवाई का असर अब सीधे अमेरिकी जेब पर पड़ रहा है।

ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए फारस की खाड़ी में बने अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है और रणनीतिक रूप से बेहद अहम 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' के समुद्री रास्ते को लगभग ठप कर दिया है। दुनिया के कुल कच्चे तेल और एलएनजी का पांचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। आपूर्ति बाधित होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ गई हैं। ट्रंप ने डलास रैली से ठीक पहले स्वीकार किया था कि चुनाव खत्म होने से पहले यह युद्ध और महंगाई कम नहीं होने वाली।

विरोधी दल का हमला और कानूनी अड़चनें

डेमोक्रेटिक पार्टी ने ट्रंप के इस वादे को तुरंत 'खोखला वादा' करार दिया है। इसके साथ ही अमेरिका के चुनावी कानूनों को लेकर भी कानूनी बहस छिड़ गई है। अमेरिकी संघीय कानून के मुताबिक, वोट प्रभावित करने के मकसद से जनता को सीधा वित्तीय लाभ देने का वादा करना प्रतिबंधित है।

हालांकि, कुछ कानून विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप के इस वादे को टैक्स में छूट देने के वादे की तरह देखा जा सकता है, जो कानूनी रूप से वैध है। साथ ही, अमेरिकी संविधान का पहला संशोधन (फ्री स्पीच) भी उन्हें ऐसा राजनीतिक बयान देने का अधिकार देता है। बहरहाल, अमेरिकी व्यवस्था में किसी भी तरह के बजटीय आवंटन की मंजूरी कांग्रेस से लेनी होती है, और बिना ठोस योजना के इतने बड़े बिल को पास कराना बेहद मुश्किल होगा।